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उच्च शिक्षा लेने वाली महिलाओं के मातृत्व लाभ को बढ़ाने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें गर्भावस्था, बच्चे के जन्म के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं को अटेंडेंस के नियमों में छूट देने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश डी.एन पटेल और न्यायमूर्ति हरि शंकर की खंडपीठ ने केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को भी नोटिस जारी किया है। कुश कालरा की तरफ से दायर इस याचिका में उन महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित और संरक्षित करने की मांग की गई है, जो गर्भावस्था के चलते न्यूनतम उपस्थिति की आवश्यकता को पूरा करने में विफल रहने के कारण जिनको शैक्षणिक संस्थान छोड़ना पड़ता है। याचिकाकर्ता ने याचिका में ‘वंदना कंसारी बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय’ के मामले में दिल्ली उच्च हाईकोर्ट द्वारा दिए फैसले का भी हवाला दिया है। उस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया था कि मातृत्व लाभ के आधार पर छूट का दावा करने वाली महिला छात्राओं के लिए नियम बनाएं ताकि वह अपनी एलएलबी की परीक्षा में उपस्थित होने से वंचित न रहें। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया है कि जैसे सीबीएसई जो स्कूलों में उपस्थिति की कमी या उपस्थिति पूरी न होने के लिए नियम प्रदान करता है, यूजीसी के पास उच्च शिक्षा के संस्थानों के लिए ऐसा कोई नियम नही है। याचिकाकर्ता ने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, 20-24 वर्ष की आयु के बीच की 47.4 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु में ही हो जाता है, इसलिए, याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि उन्हें गर्भावस्था, बच्चे के जन्म के बाद की देखभाल जैसे कारणों के कारण अटेंडेंस में कमी में राहत न देना, ऐसी महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करना है। इसके अलावा, ‘पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें यह कहा गया था कि महिलाओं को अनुच्छेद 21 के तहत एक संवैधानिक अधिकार है कि वे अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हिस्से के रूप में अपनी खुद की प्रजनन पसंद का चयन कर सकें। इसलिए, याचिकाकर्ता के अनुसार, यदि किसी महिला के गर्भवती होने के कारण उपस्थिति में आई कमी के कारण उसे शिक्षा लेने से रोका जाता है है तो यह अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार के उल्लंघन के समान होगा। यह भी बताया गया है कि चूंकि कई महिलाओं को अपनी शादी से संबंधित निर्णय लेने की अनुमति नहीं है, इसलिए उनकी अनूठी परिस्थितियों को शामिल करते हुए उच्च शिक्षा के उनके अधिकार को संरक्षित किया जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि ‘राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए, कि उनके प्रजनन के अधिकारों का प्रयोग करना या उनके नियंत्रण से परे या बाहर के निर्णयों के कारण एक बच्चे को वहन करना ,उनकी शैक्षिक आकांक्षाओं के लिए हानिकारक न बने। याचिका में उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाली महिलाओं को भी मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत दिए गए संरक्षण को देने की मांग की गई है। इसके लिए तर्क दिया गया है कि राज्य, एक कल्याणकारी कानून के तहत, कामकाजी महिलाओं और अध्ययनरत या पढ़ने वाली महिलाओं के बीच भेदभाव नहीं कर सकता है।

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